चाय और मैं..
चाय... वाह क्या चीज़ है चाय! कहो तो सुना दूँ एक किस्सा... एक चाय थी, एक वो थी, और एक वो समय था... हा हा हा हा... तो सुनो — ये उस समय की बात है जब हमने रखे थे कदम अपनी यौवनावस्था में। एक गुमान था हमें अपने रूप पर, एक आत्मविश्वास था जो छपक के झलकता था आँखों से, आज की भाषा में कहें तो — "aura" था जनाब! हम चलते थे तो लगता था हवा भी रुक कर पूछे — "किधर चल दिए आप?" दिन ढलते ही नुक्कड़ वाली दुकान पर भीड़ नहीं, महफ़िल लगती थी। और उस महफ़िल की जान होती थी — चाय। छोटे से कुल्हड़ में बड़ी-बड़ी बातें, भाप उठती थी कप से, और ख्वाब उठते थे दिल से। वो चाय ही थी जो जुबां को बहकाती थी, और वो... वो तो दिल को! कभी आँखों से, कभी मुस्कान से, जैसे हर चुस्की में छुपा हो कोई इशारा। किसी दिन कम शक्कर होती तो भी मीठी लगती, क्योंकि सामने जो बैठी होती थी वो थी — "वो!" उसकी बातें और चाय — दोनों में नशा बराबर का था। हा हा हा... अब उम्र बढ़ी है, जिम्मेदारियाँ बड़ी हैं, पर एक चाय की प्याली आज भी ले जाती है वहीं — जहाँ सिर्फ हम थे, वो थी... और चाय थी....
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