अंतिम मंज़िल
सभी,सबकुछ हर बार शुरू से शुरू करना चाहते है, बिना गलती किये ही सबकुछ जितना चाहते है। हर बार सिर्फ जीतने की दौड़ मे खुद को खो देते है, मुह मोड लेते है, और बार बार सबकुछ शुरू से शुरू करना चाहते है। क्या हर बार जीत मिल जाती है तुम्हे, बिना रोये सिसके मंज़िल के पास हो जाते हो तुम? ये हुनर तो मैंने नही सिखा, सिर्फ मंज़िल ही अंत है तो ऐसा मुझे क्यों नही दिखा। क्या हार मे, मर जाता है तुम्हारा सपना, क्यों भूलते हो हर बार नही मिलता तुम्हे तुम्हारा अपना। जब सब कुछ जीतकर अंत मे खुद को साहसी पाओगे तुम, तब ऐसा लगेगा कोई अंतर नही अंत तक हौसला रखने और जीतने मे, तब असल मायने मे जीत को गले लगाओगे तुम।।
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