"रंग स्मृति"
रंगों का पर्व समीप है, वल्लभा, पर दूरी की धूप अभी शेष है। आँगन में अबीर सजा है फिर भी, मन में तुम्हारी अनुपस्थिति विशेष है। तुम आई थीं जैसे श्वेत पात पर अचानक उग आया अरुणोदय हो, मेरे नीरस दिन के निर्जन वन में जैसे खिला प्रथम मधुर पुष्पोदय हो। तुम्हारी दृष्टि—नील गगन की गहराई, तुम्हारी वाणी—बसंत की बाँसुरी। तुम्हारे स्पर्श से जगे जो रंग, वे अब तक हैं मेरी आत्मा में संवरी। यह होली मेरे लिए प्रतीक मात्र नहीं, यह स्मृतियों का सुवासित उत्सव है। जहाँ हर कण में तुम्हारा ही अंश, हर रंग में तुम्हारा ही प्रतिबिम्ब है। यदि इस बार संग न हो पाऊँ, तो भी विश्वास अडिग रहेगा ; तुमने जो रंग भरे जीवन में, वे कभी न समय से फीका पड़ेगा। वल्लभा, तुम हो तो रंग शाश्वत हैं, तुम बिन सब कुछ धूमिल छाया; मेरे अस्तित्व की हर रेखा में तुम्हारा ही आलोक समाया। 💐🌹🌹।।शुभ होली वल्लभा।। 🌹🌹💐
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