जिंदगी का खेल
क्यु इतना सोचते हो, यू खोये से रहते हो, खुली आँखों से सोये रहते हो,, क्यों फिक्र इतनी जब कुछ होना नहीं,, इस चिंता में अपनी ख़ुशी को खाना नहीं,, क्या गिला कि सबने हमें आजमाया हैं,, सबको खो कर ही तो, तुमने ख़ुद को पाया हैं, ये जिंदगी हैं, इसका खेल निराला हैं,, मतलबियो का, यहाँ पर बोलबाला हैं,, न सोच इतना कि सबकुछ यही रह जाना हैं, चार दिन की जिंदगी,, ; फिर सबको चले ही जाना हैं,,!!
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