सूरतेहाल
🌞" सूरतेहाल "🌞 मैं औरन को क्या देखूं मैं खुद को देख लज़ाया रे ll झूठ- पाट की कीचड़ मे घुमू मैं सना सनाया रे काया की रज को सच मानू देखो कैसा भरमाया रे !! मैं औरन को क्या देखूं मैं खुद को देख लज़ाया रे ll बेसुध हो, कभी दंभ धरा लालच को कभी जगाया रे ईर्ष्या की आग जली मन में तो अपना स्वार्थ पकाया रे !! मैं औरन को क्या देखूं मैं खुद को देख लज़ाया रे ll कुछ खो बैठन के डर में पल-पल का चैन गंवाया रे हिरण की ज्यों वन-वन घूमा कस्तूरी ना मिल पाया रे मैं औरन को क्या देखूं मैं खुद को देख लज़ाया रे ll सत्-रज-तम के इस मेले में माया ने खूब फंसाया रे दुनिया की सुरत निहारन में मैं "खुद" को ना गढ़ पाया रे मैं औरन को क्या देखूं मैं खुद को देख लज़ाया रे ll
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
