अभी अभी
अभी-अभी इक पत्र लिखा है तुमको रोते रोते अभी अभी खिलखिला उठे हम आंसू बोते बोते। अभी-अभी कानों में गूंजा गुंजन गीत तुम्हारा, अभी-अभी दिल में उतरा मधुरिम संगीत तुम्हारा, अभी-अभी हमने है जानी प्यार में दुख की सीमा, दूर तलक जाना है तो फिर चलना होगा धीमा, अभी-अभी अनुभव पाया है निज "निधि" खोते खोते, अभी-अभी खिलखिला उठे हम आंसू बोते बोते। अभी-अभी इन शब्दों ने श्रृंगार किया है अनुपम, अभी-अभी ख्वाबों में उतरा वैदेही का रूपम, अभी-अभी चंद शब्दों में लिख दिया जीवन सारा, अनगढ़ और अवाचक बनकर रह गया पत्र हमारा, अभी-अभी हम रंक बन गए राजा होते होते। अभी-अभी खिलखिला उठे हम आंसू बोते बोते। अभी-अभी इक पत्र लिखा है उनको रोते रोते अभी-अभी खिलखिला उठे हम आंसू बोते बोते। - उत्कर्ष पाठक उत्पल
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
