किस बात का डर हैं।
बोलो किस बात का डर हैं ? कुछ चीज जो औरों को मिल जाए , लेकिन तुम्हे न मिले। कुछ वर्दियां जो औरों पे खड़ी फबे, लेकिन तुमपे ढीली पड़ जाए । किस बात का डर है? जो तुम्हे कभी समझे ही नहीं, उन्हें न समझा पाने का । किस बात का डर है ? जो इज्जत तुम्हारी थी ही नहीं, उस इज़्जत के खो जाने का।। अरे किस बात का डर है ? जो अपना कभी था ही नहीं, उसका रूठ जाने का । अब बताओ तो किस बात का डर है? किसी रास्ते का मुसाफ़िर बनकर, मंजिल न पाने का । इस डर ने तुमको बहुत डराया !!, अब थोड़ा डर की सुनना सीखो!! ये डर बहुत कुछ बोलता है ! थोड़ा डर की सुनना सीखो!! डर इसलिए की वो चीज जिसे दिल से तुमने मांगी नहीं, उसे पाने निकले तुम ! डर इसलिए की तुमने मंजिल को बना ली मोहब्बत, और प्यारे रास्ते से भागते चले गए। डर इसलिए की तुम सबको, अपना बनाने की होड़ में , खुद किसी के पूरे न हो पाए। डर इसलिए की तुमने, दूसरो की दिल का खूब सुना, पर कभी अपने दिल का हो न पाए। अब थोड़ा ये सोचो डर के आगे क्या है !!! शायद कुछ नया जो आज तक हुआ ही नहीं, शायद वो साहस,जो दिल में छुपा बैठा था कहीं, शायद वो सुकून , जो किसी कोने में रखा था, या फिर वो आजादी जो तुमने खुद से ही छीनी थी।। उत्कर्ष केशरवानी !!
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