क्या चुनूं
जब मैं अकेला होता हूं तो खोया हुआ पता हूं अपने आप को गहरे और ऊंचे विचारों में मगर जब अपने दोस्तों के साथ होता हूं तो ख़ुद को पाता हूं उन्हीं के जैसा या शायद उनसे भी ''छोटा'' वजह ? पता नहीं ! शायद कुछ क्षण हंसने के लिए ये जानते हुए भी कि हंसना सुख नहीं है ये ठीक वैसा ही है जैसे अपने प्रेमी या प्रेमिका से बात करना "ख़ुशी" देता है मगर उसका इंतजार "सुख " क्योंकि अंततः "बातें" सीमित हैं "इंतज़ार" अनंत "मिलना" सीमित है "एकांत" अनंत "हंसना" सीमित है और "सुख" अनंत अरुण सर्वेश
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