न्याय भी बिकता है।
हां, न्याय भी बिकता है यहां पैसे के जोर से, सच्चाई की चीखें दब जाती है झूठ के शोर से। दौलत की तराजू में न्याय बिक जाता है, न्याय का पलड़ा पैसों के बोझ से झुक जाता है। कानून की किताबों में लिखे है शब्द बहुत सुनहरे, गुनाहों से ज्यादा निर्दोषों को मिलते है ज़ख्म गहरे। आंखों से पट्टी तो हटी फिर भी क्यों बंधे है इंसाफ के हाथ, बिकता है हर कोई बस औकात की है बात। सिंहासन पर बैठे है, न्याय के ठेकेदार, उनके एक इशारे से झूठ बन जाता है हर इकरार। उड़ जाते है फैसले , रिश्वत की हवा में, बेइमानी फैली है , समाज की इस जहरीली फिज़ा में। [न्याय की मूर्ति भी अब आंसु बहाती है, ये कैसी अदालत जहां हर बात बिक जाती है। कब बदलेगा ये मंजर , कब बदलेगी ये रीत, कब होगी अन्याय पर सच्चे न्याय की जीत?
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