अजनबी के साथ गुजरी ज़िंदगी ..
अजनबी के साथ गुजरी ज़िंदगी बस तमाम उम्र उस अजनबी के साथ गुजारनी है, जिसे दिल ने कभी अपना माना नहीं, पर सहना है। हर लम्हा एक सवाल है, हर पल एक जज़्बात है, ख्वाबों की इस गलियों में एक अधूरापन साथ है। वो मुस्कान जो कभी दिल को छू नहीं पाई, वो बातें जो कभी दिल से दिल को मिलाई नहीं। फिर भी उस अजनबी के साथ अपने सपने सजाने हैं, छुपे जख्मों को मुस्कुराहट में छुपाने हैं। हर सुबह उम्मीदों के साथ उठना है, हर शाम तन्हा दिल को समझाना है। कभी किसी के साथ दिल की बात करना, पर वो अजनबी सिर्फ नज़रें मिलाना है। यह शादी नहीं बस एक संघर्ष है, जहाँ प्यार के साथ भी दूरी है। बस तमाम उम्र उसी अजनबी के साथ जीना है, हर शादी की ये अनकही कहानी है, यही रिश्ता है।
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