बस का सफर......
घर से निकल कर स्टेशन पर पहुंचने के बाद एक बस मिलती है जिसमें एक महान व्यक्ति थे जिहोने अपना स्थान त्याग कर मुझे बैठने को कहां वहां और भी बहूत से लोग थे परंतु उनका सोचने का तरीका जो था वो मुझे भा गया क्योंकि इस पीढ़ी में स्त्रीयों को सिर्फ एक वस्तु समझा जाता है उन्हें सिर्फ काम करने के तथा घर संभालने के लायक ही समझा जाता है बस चलते चलते रुक गई और मेरे विचार थम गए मानो मेरा मन रो रहा था क्योंकि बस में अजीब संगीत बजाए गए थे शायद कोई बहुत दुखी था जो संगीत के माध्यम से अपना दुख बयान कर रहा था और कंडक्टर साहेब ने पीछे मुड़कर नही देखा शायद वो अपना गम छुपा रहा था ..... बहुत दुखी है सब पर सब अपना गम छुपाना भी अच्छे से सिख गए है... संसार दुखों का घर है हमारी इच्छाएं ही हमारे दुख का कारण है इच्छाएं त्यागो और खुल के जियो🌸
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