धीरज शेखावत
मझधार कि नैया हुं मैं कोई खैवेया बन जाये थाम के पतवार कोई तो पार लगायें बिखरे हुये मेरे सुख चैन को कोई तो समेट लाये वक्त का पहिया तो देखो साहब अपने और सपने दोनों मुंह फेरे जाये गुनाह बताये बिना ही सजा देकर जाये क्या खुब सजी है महफ़िल बोली लगाने वालों कि कोई कोढ़ी तो कोई करोड़ों लगा जाये मझधार कि नैया हुं मैं कोई खेवैया बन जाये धीरज शेखावत
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