ये सिर्फ़ एक नौकरी नहीं
ये सिर्फ़ एक नौकरी नहीं ये किसी के सपनों की पहली उड़ान थी जिसे किसी के मां-बाप ने सोते जागते देखा होगा ये तुम्हारे लिए सिर्फ एक मामुली नौकरी होगी लेकिन ये किसी के सालों की तपस्या है जिसे तुमने क्षण भर में रद्द घोषित कर दिया ये बस एक नौकरी नहीं ये उस बूढ़े बाप की उम्मीद थी कि एक दिन उसका बेटा उसके कंधे के भार को कम करेगा जिसे इस भ्रष्ट सिस्टम ने नोच खाया ये सिर्फ तुम्हारे लिये एक नौकरी होगी लेकिन किसी के लिए ये उस समाज में जीने की लालसा थी जिस समाज ने उसे नकारा समझा था ये नौकरी नहीं ये उस भाई का विश्वास भी था जिसके बहन का विवाह उस दहेज़ नामक कुप्रथा के कारण नहीं हो पा रहा जिसे इस रूढ़िवादी समाज ने अपने लोभवश रचा है आखिर कौन है इसका जिम्मेदार ये चुनी हुईं सरकार जिसे लोकतंत्र का चेहरा माना जाता है या नौकरशाही या हम खुद जो इस व्यवस्था से सिर्फ एक निष्पक्ष इम्तिहान की गुज़ारिश करते हैं
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