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अकेले एक सफर पर निकला हूँ, घर छोड़ ज़िंदगी के दौड़ पर निकला हूँ। आँखों में डर, चेहरे पर मुस्कान, एक उमंग की किरण लिए निकला हूँ। जो सोच कर छोड़ा था घर, उसी सोच से उलझ गया हूँ। ज़ख्म तो न भर सका मगर, खुद को ही मिटा रहा हूँ। सपनों के सागर में डूबा, ज़िम्मेदारियों से अब डर रहा हूँ। कौन कहता है लड़के रोते नहीं हैं? आज, बेख़ौफ़ी से यूँ रोने लगा हूँ...
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