चाय और वो..
चाय, बारिश, बालकनी… और… और… और उसकी यादें। उसकी… किसकी? उसी की, जिसके केशों के कालेपन से छाते थे बादल, और आँखों के प्रतिबिंब से बनता था इन्द्रधनुष वो जब मुस्काती थी, तो जैसे बादल भी थम जाते थे, और जब चुप रहती थी तो बारिश सिर्फ़ बाहर नहीं, अंदर भी बरसती थी। उसका होना, कोई देह नहीं… एक अहसास था, जो चाय की भाप में घुलता, बारिश की हर बूँद में बरसता, और बालकनी के कोने में चुपचाप बैठा रहता। वो आज भी नहीं आती, पर हर मौसम उसी के क़दमों की आहट लेकर आता है। उसकी यादें — कोई धुंधली सी तस्वीर नहीं, बल्कि हर दिन की शुरुआत हैं… हर रात का सपना चाय ठंडी हो जाती है… बारिश थम जाती है… पर उसका एहसास — वो अब भी गर्म है, भीगा है, और अपना है। ...Swaराज
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