चाहत
भर कर ख़्वाब बड़े- बड़े इन छोटी- छोटी आंखों में ढूंढ़ रहें हैं रास्ता आसानी से जीने का अगर मागे ही मिल जाए सबकुछ तो क्या होगा मोल पसीने का गिन- गिन ये पाप करें सोचकर के धुल जाएंगे लगता है यही काम बचा है गंगा, तीर्थ, मक्का और मदीने का ना पीने वाला लाख में भी न पिए पीने वाला ढूंढ ही लेगा कोई बहाना पीने का हंसता हूं ये सोचकर सेहत अच्छी रहती है देखके फितरत लोगों की कम नहीं होता दर्द ये मेरे सीने का
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