गोबर्धन पूजा
गोकुल के वासी सब, खेलत है संग कृष्ण कन्हैया, नाचत है वे नचावत है जो है, तीन लोक के पालनहार कन्हैया ! कान्हा गोबर्धन पर्वत उठाए, तब गिरधर गोपाल कहाए, गोपी संग पूरे वृज को बचाए, देव भी नभ से फूल बरसाए ! तोड़े घमंड इन्द्र का कान्हा, छोटी छिंगुरी से पर्वत उठाए, सात दिवस ताड़व किया इन्द्र ने, फिर हार मान प्रभु चरणों में आए ! अठारह कोस की गोबर्धन परिक्रमा, जो लगाए सभी पाप कट जाए, युग की ये रीति गोबर्धन पूजा की, आज भी जग में, गोकुल में बजत बधाए !
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
