"कहां गया मेरा डंडा!!"
राजनैतिक पार्टी लहराए सद्भाव झंडा लोकतंत्र बोले – कहाँ गया मेरा डंडा ? बेरोज़गारी की मार, आँखों में आँसू है पैसे वालों की ताक़त, आम आदमी साधू है। वो मंच पर बोलें बड़े-बड़े जुमले हवा में उड़ें सिर्फ़ सुनहरे ढोंग के धुमले, गरीब की मेहनत, धूल में दबी कहानी है भ्रष्टाचार की किताब में हर पन्ना पानी है। आया चुनाव, वादे बने ताश का घर सपनों का महल, हकीकत का डर, भ्रष्टाचारी की गाड़ी, चमकती सड़क पर है आम आदमी थककर रोए, घर अंधेरे सफर में है। राजनैतिक पार्टी हँसे, जनता पर कटाक्ष करे लोकतंत्र की शान, अब सिर्फ़ पैसों में भरे, भौंक सुनाई दे, जनता की आवाज़ हारी है बेरोजगारी ! अब बस कहने को इक गाली है।। बाहुबल की हनक,कानून बनी सवारी है आम आदमी की मजबूरी,बिन सिर पैर की सवारी है, अब जइसे राजनैतिक पार्टी लहराए धर्म का झंडा लोकतंत्र बोले- अरे कोई ढूंढ ही लाओ मेरा डंडा!!
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