गुफ़्तगू
क्यूँ ख़फ़ा मुझसे है तू क्यूँ अखिर तू है रूठा क्या कमी है मुझमे काश यह तू दे बता ऐसे कब तक यूँ चुप रहेगा मुझसे तू क्यूँ ना करले हम थोड़ी सी गुफ़्तगू ... अपने ज़ख्मों से रहता अनजान हूं क्यूँ बेवजह में किसीको क़ुसूर दूँ मेरे हर सितम से काश तू होता रुबरू जो कर ली होती हमने थोड़ी सी गुफ़्तगू ... खुद में ही खुद से क्यूँ उलझा सा हूं खुद से ही जीतू मे खुद में ही हारुं खुद में ही खुद से खुद को जानू जो कर लूं खुद से थोड़ी सी गुफ़्तगू ..
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