हकीकत से
हकीकत से मुँह ही छिपाते रहे हो सदा नकली रुख़ ही दिखाते रहे हो जो कुर्बान तुमपे हमेशा रहा है सितम उसपे हरदम ही ढाते रहे हो मिला रुख़ जो मासूम हर वक्त उसका सनम फायदा ही उठाते रहे हो न जाने है क्या सोच मज़लूम है जो हमेशा उसे ही सताते रहे हो बहुत भाता है तुमको छिपना छिपाना कि परदा सदा ही गिराते रहे हो जो थे मेरे कातिल मेरे जानेजाँ तुम उन्हें बज़्म में ही बुलाते रहे हो मेरे दौरे गर्दिश में क्यूँ * राज * बोलो निगाहें चुरा कर ही जाते रहे हो
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