कउया बनल हे हंस
जे ढनकल हे अप्पन नाम ला, ओकरा मीरची बड़ लगतय। जे लिखs हय जनचेतना ला, ओकरा तो आनन्द अयतय।। अलर-बलर लिखे-गावे सुनावे, ऊ कहे अपने के मगही गयाता। मगही से जेकर जड़ जुड़ल नैय, ऊ बनल हे मगही भाग विधाता।। सहर में जे दिन काट रहल हे, जे खेत खरिहान हइ भूलल। ऊ मगही के अब बनल पुरोधा, बहुतो मगही दुकान हे खुलल।। डेगे डेग एकर बैनर हे टंगल, सहर में गज-गज मंच सजल हे। गाम-गिराम के मगही उड़ीयाइल, इहाँ देखs मगही बनल गजल हे।। मंच बनाके हे गेंड़ूरी मार ले, अगयानी पद हथियइले हे। अप्पने के समझय ऊ गयानी, जानय वलन के धकियइले हे।। कउआ बनल हे हंस मगह में, बड़का डैना ऊ फईलइले हे। बुझय खाली अप्पने के गयानी, दुसर पर नाक-भौ सिकुड़इले हे।।2 नरेंद्र सिंह,अतरी, 07.04.2025
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