विधाता छंद
शीर्षक:जन्मभूमि ही स्वर्ग है रहें गर्वित स्व मृतिका पर, वहाँ पर सिर झुकाना है। लिए उत्त्पन्न जिस रज में, हमें वह ऋण चुकाना है।। सदा यह याद है रखना, धरा भी एक धात्री है। इसे ही स्वर्ग सब मानो, यही तो अन्न दात्री है।। प्रथम पग था रखा इसपर, इसी की धूल में खेला। बढ़ा था लोट मिट्टी में, कटी थी उम्र शुभ बेला।। रखो सब मान इनका भी, समझ माँ तुल्य भरणी को। करे कल्याण जो जन-जन, नमन शत मातृ धरणी को। नरेंद्र सिंह 11.04.2025
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