गझल : मोहब्बत की दीवारें
मोहब्बत की दीवारें हर घड़ी खडी रहती है मुस्कुराते हुए ये नजराना, यू बहलाती है इश्क की फरमाइश यू फरमाते रहते है कोई तो यू फरमाइश ऑंखे, ही कहती है लाख कशिश करे मोहब्बत नहीं झुकती है हम सर झुकाते मेरी गझल, नहीं झुकती है समंदर भी लहरों से प्यार भरा पैगाम भरता है वहीं लहरें एक दिन दीवार बनके,, खडी रहती है चांद भी निहारता है हर राहे को हर दिन हर उम्मीद के फासले नजदीक, ही होती है धनराज नथू बाविस्कर मो.९०१६०३१७१२
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