अजनबी सा अपना
अजनबी था वो, पर जाने क्यों, पहली ही मुलाक़ात में घर सा लगा। भीड़ में था पर अलग सा दिखा, मन की किसी तार से जुड़ सा गया। नजरों में थी एक गहराई अजीब, जैसे बरसों पुरानी पहचान हो। बातों में थी एक मासूमियत, जैसे दिल में छुपी कोई जान हो। संवेदनशील सा, हर दर्द को समझे, हर चेहरे की मुस्कान की कद्र करे। अपने से पहले औरों की सोचे, ऐसा इंसान कहां हर दिल में बसे? पहचान है नई, मगर एहसास पुराना, शायद किस्मत का कोई फ़साना। कभी सोचा न था, पर आज लगता है, अजनबी भी कभी घर सा लग सकता है।
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