आँगन की चिड़िया उड़ चली
वह गुड़ियों सा बचपन, वो लड़ना-झगड़ना, भाई की हर बात पर, वो धीरे से बिगड़ना। आज वो चहकती चिड़िया, अपना नीड़ बदल रही है, बाबुल की वो लाडली, सात फेरों में चल रही है। पिता की आँखें झुकी हैं, पर समंदर उनमें गहरा है, मजबूत कंधों पर आज, बेबसी का एक पहरा है। जिस हाथ को पकड़कर, उसने चलना सिखाया था, आज उसी हाथ को छोड़, उसने पराया देश अपनाया था। माँ का आँचल भीग गया, ममता की छाँव रोती है, बिटिया की विदाई में, माँ की रूह ही खोती है। रसोई के वे बर्तन भी, आज चुपचाप खड़े होंगे, माँ के हाथ के निवाले, अब कुछ फीके से लगेंगे। भाई का दिल भारी है, पर वो आँसू छुपाता है, "जल्दी आना मिलने वापस", बस यही कह पाता है। बचपन की वो सब यादें, अब कमरे में कैद होंगी, घर की सब रौनकें जैसे, डोली के साथ विदा होंगी। गहनों की खनक में भी, एक सन्नाटा सा छाया है, अजीब है ये रीत रब की, जिसे पाला उसे ही पराया बनाया है। दुआ है उस आँगन में भी, तू खुशियों के फूल खिलाना, पर इस सूने घर की याद में, तू पलकें न कभी भिगोना।
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