"खास" था "अब" आम है
जो दूर था तो "खास" था अब पास है तो "आम" है वो शख्स जो करीब था वो नहीं नज़र के सामनें एक कोने मे पडी थीं वो यादें सभी जो खास थीं वो अब करती मुझसे अर्जियाँ की "मुझपे पर्दा डाल दे"। जो दूर था तो पास था अब पास है तो दूर है मौजूदगी का एहसास था जब दूर कोई खास था अब बांटती तन्हाईयाँ अब जो हूँ तेरे पास मैं गुज़ारिशों के शोर में कुछ बातें थीं जो दब गई वो बातें थोड़ी खास थीं जो इन्तज़ार में सिमट गई जो दूर था तो मुझमे था अब पास है तो जुदा सा है मेरी ख़ामोशियों के बाद भी जवाब थे वही पड़े कुछ सवालों की कतार में पर तु सोचता तो पूछ लेता खुद ही मेरा हाल भी जो चाहता तो तु कर ही लेता खुद से कुछ सवाल मी जो दूर था तो सच्च सा था अब पास है तो झूठ है तु जो कहता था अज़ीज़ हैं मेरे होठों की ये सुर्खियाँ तुने खींच कर निकल दी चेहरे से मैरी मुस्कुराहटें जो मेने सच समझ कर रख लिया तेरे झूठ को यूँ थाम के जख्म गहरे लगे मेरी मुठ्ठीयों पे पर मेरे दिल पे क्यूँ निशान हैं? जो दूर था तो "खास" था अब पास है तो "आम" है
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