वादा
ये मुसाफिर इतना बता फिर मिलेगा मुझे तो कहाँ हमदर्द था तु मेरा मगर क्यों हो गया बेवफ़ा । तू मुसाफिर था मेरा चैन लेकर चला गया मेरी खुशी मेरा सुख मेरा सब कुछ लेकर चला गया अब बोल मैं करूं क्या, तुझे अब कहूँ क्या तू मुसाफिर था तुझे जाना ही था, तू अपनी मंजिल चला गया सुन बेवफ़ा ! तुमने बेवफ़ाई की पर मैंने तो तेरे हर बात वादों से सगाई की मैं आज भी जीता हूं तेरे लिए तड़पता हूं मैंने वफा किया था, तुमने जफा किया था तुमने अपना किया और मैं आज अपना करता हूं। अब सुन मैं जो कहता हूं तू पछतायेगी , तू फिर आएगी जब मेरी सफलता का बखान सुनेगी पर मैं तब बदल चुका होऊँगा, तेरे धोखे में तपकर सोना हो चुका होऊँगा प्रिय नीरज भाई के लिए......
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
