कई अर्सों के बाद
वो पल थम सा गयी जब मेने उस आइने में देखि धुल से ढकी हुई वह सीसा जो मेरे गुज़री हुई कल की थी सखि पास जाने की हिम्मत नहीं थी पर नजर चुराके भाग भी न सकी कुछ इस तरह मदहोश बन गयी थी वह यादों में खोने से खुदको न रोक सकी धुप की सौहाद में पिघल कर मन ही मन में मुस्कुराने लगी खुदकी सादगी में गुम हो कर न जाने क्यों शर्म से भीगने लगी आइना को करीब से देखने चली अनजाने में खुदको निहारने लगी कई अर्सों के बाद जब खुदसे मिली खुद ही खुद्की आदत में ढलने लगी
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