ए जिंदगी
जिंदगी पाबंद है उसूलों की, आगे बढ़ती जाती है नित्य प्रसन्नचित होकर जब दिल से गले लगाती है निरुत्तर निस्तब्ध होकर जानी है जीवन की परिभाषा मुख बधिर नन्ही सी थी, जीवन के पन्नों में सिमटी थी कहती है कभी सुनाती है, नए पुराने अफसाने ये जिंदगी उलझती है कभी सुलझाती है, अंतर्मन की ये डोर जिंदगी सुख है तो कभी दुख है रूबरू कराती दोनों से है बढ़ाती है कभी घटाती है ये हौसले जीने के ये जिंदगी कहना बाकी है बहुत कुछ इस जिंदगी से मेरी कलम लिख रही है धीरे-2 तेरे फरमान ए जिंदगी
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