अभागी
विलाप के भय से, दुखों को सांत्वना देने, उम्मीद के बिखरने के डर से रूदन करते हुए हृदय के कहीं पुरुष पिता न दे, अपना आपा खो, इसलिए कह दिया समाज ने भी लक्ष्मी हुई है भई, बधाई हो! अरमानों की पतंग धागे से कट गई खुशी की चिड़िया काले बादलों में कहीं छट गई, बस ना चला ना तो प्राण ले लेता, मुझे देव ही चाहिए देवी नहीं चिल्ला कर सबको कह देता... और मन मसोस कर उसे घर ले भी आए , पर बेटी है उसे दुनिया से कौन बचाए?? 5 साल की बेटी को साड़ी पहना पाउ कैसे? उसके चंचल सपनों को भला बांध पाऊं कैसे? मैं जीवन में आगे बढ़ने के स्वर्णिम स्वप्न देखती रही... किंतु एक घृणित नजर.. एक टक उसको भेदती रही पग पग पल पल डराया, जो ना मानी तो कायरता को हथियार बनाया.. छोटे कपड़े पहने होंगे... छोटे कपड़े पहने होंगे, भई छोटी सी तो बच्ची थी, पर उन दादी का क्या जिनकी सारी मर्यादा सच्ची थी, तन पर तो जिनके साड़ी थी, पर, अब तो समझ चुकी हूं मैं भी की नारी की गलती सारी थी..... जो सदियों से इसको सहती आई... लड़की हो तुम कमजोर हो एक दूजे से कहती अाई, जब-जब सोच सोच के कोई कारण पता लगाती हूं, जनने की शक्ति को ही में सारा दोष लगाती हूं, ऐसे न को दूध पिलाने क्यों यह छाती पाई, ऐसी औलादे को जनने क्यों यह जननी जाई, संस्कार खो गए सभी के किसी अंधेरे कमरो में, बलात्कारी पल रहे हैं आलीशान बंगलो में, कब तक दर-दर भटकेंगे, कब तक यू सर पटकेंगे कितनी और बेटियां खोएंगे कब तक खून के आंसू रोएंगे क्यों भीख रक्षा की मांगे क्यों हम दर्दी पांए, जिनको जना हमी ने ...उनके द्वारा मारे जाएं? आन पड़ेगी मानव जाति को विपदा भारी, जब हाथ खड़े कर देगी , तुमको जनने से नारी दुशासन की सभा लगी है , चारो तरफ दिशाओं में, शक्ति दुर्गा काली का बल है , नारी तेरी भुजाओं में...पहचानो भीतर की काली को , अब खड्ग उठाने की बारी है, समझा दो दुनिया को , जिससे चलती ये दुनिया वो एक नारी है..!
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