"झूठा हमसफर"
वफ़ा की उम्मीद में हम उम्र गुज़ार बैठे, काँच के टुकड़ों को हम कोहिनूर मान बैठे। वो हँसकर मिले तो लगा खुदा मिल गया, पर वो तो महफिल सजाने का सामान ढूँढ रहे थे। तुमने तो बस एक पन्ना पलटा था अपनी ज़िंदगी का, यहाँ तो पूरी किताब ही राख हो गई। जो कसमें खाते थे साथ जीने-मरने की, आज उन्हीं के शहर में हमारी पहचान खाक हो गई। अब न कोई शिकवा है, न आँखों में नमी है, बस एक सबक है जो ज़िंदगी ने सिखाया है। कि दिल लगाने से पहले ये जान लेना ऐ दोस्त, यहाँ हर चमकते चेहरे के पीछे एक गहरा साया है।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
