"मैं प्रवाह हूँ"
मुकम्मल मैं नहीं अभी, पर मैं कहीं रुका नहीं, झुका जो सबके सामने, मैं वो कभी सिर नहीं। मैं शून्य की गुहार क्या? मैं गर्जना का वेग हूँ, मैं कल की कोई भीड़ नहीं, मैं आज का संवेग हूँ। न मंज़िलों का मोह है, न रास्तों का खौफ़ है, जो रुक गया वो ज़ुल्म है, जो चल रहा वो शौक़ है। दबा सको जो तुम मुझे, वो बेड़ियाँ बनी नहीं, मैं 'एक' की कतार का, अदना सा कोई अंश नहीं। मुझे न जीत का नशा, न हार का मलाल है, मेरी ये जो उड़ान है, ये वक्त का सवाल है। मैं वो नहीं जो ढल गया, किसी पुराने सांचे में, मैं आग बनके जल रहा, ज़माने के हर ढांचे में। परिणाम की जो कैद है, मैं उसको तोड़ आया हूँ, विराम को मैं राह में, अकेला छोड़ आया हूँ। मैं प्रक्रिया का शोर हूँ, मैं यात्रा का गान हूँ, मैं खुद में एक विद्रोह हूँ, मैं खुद ही इक तूफ़ान हूँ।
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