बेटे में पिता का बचपन
एक मदारी अपने बेटे में खुदका बच्पन देख रहा था। बेटे की आँखों में चमक देख, मदाही को याद आता था , कभी वो भी यूँ ही दुनिया से बेखबर खेला करता था | उसकी आँखों में एक सपना पलता, कि बेटा उससे आगे बढ़ जाए, न सिर्फ भीड़ में हँसी बाँटे, बल्कि अपनी अलग पहचान बनाए। अपनी बचपन की सारी आदतें वह अपने बेटे में देख पाता था, इसीलिए कभी खुशी से भर जाता, तो कभी अनजाने डर से काँप जाता था | -बिनीत पराजुली
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