सम्बन्ध का समवेत स्वर
क्षणिक कलह की धूप जली थी, मन के आँगन छाया क्षार, पर भीतर अब भी स्पंदित है अनकहा, अविरत, निर्मल प्यार। तुम नभ की निर्भीक दिशाएँ, स्वच्छंद पवन की गति-सी हो, मैं शांत सरोवर-सा ठहरा, विश्वास-दीप की ज्योति-सी हो। तुम कहो ;बंधन क्षीण रहें, मैं चाहूँ सान्निध्य का हर्ष। तुम्हे गगन का मुक्त विस्तार, मुझे समीप का मधुर स्पर्श। न तुम त्रुटि, न मुझमें दोष बस भाव-भंगिमा भिन्न हुई तुम राग स्वतंत्रता की वीणा, मैं प्रीति-ताल में लीन हुई। प्रीति न केवल शब्द-विनिमय, न केवल क्षणिक मनुहार, प्रीति समर्पण का संतुलन है, सम्मान-स्पर्श का आधार। आओ फिर यह मान लें, हम ही से यह सम्बन्ध पूर्ण, तुम स्वाधीन, मैं समर्पित, दोनों मिल जीवन-गीत करें सम्पूर्ण।।
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