हम जमता हैंभगवान भरोसे
(13.12.2001 और 13.12 2023 में क्रमशः पुराने संसद भवन पर हमला और नए संसद भवन में घुसपैठ पर कविता) 22.शीर्षक:हम जनता हैं,भगवान भरोसे खुद सभीत हैं ,हमारे भाग्य नियंता जिसको चुनकर भेजती है जनता; जिसके बूते कूदती है निरीह जनता, संसद में वे स्वयं असुरक्षित है रहता। आखिर हम सब किसको अब कोसें, हम जनता हैं, मात्र भगवान भरोसे। जिस पर अति राजस्व झोकें जाते हैं वे भी सुरक्षा के घेरे में धोखे खाते हैं जहाँ कड़ी सुरक्षा,संसद किला अभेद्य वैसी जगह पर भी जब सुरक्षा में छेद। भला कब तक है आम जनता की खैर यह सवाल मन में , लगा है लगने तैर आखिर हम सब किसको अब कोसें, हम जनता हैं, मात्र भगवान भरोसे। नरेंद्र सिंह 13.12.2023
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