हे सखी!
क्या करना है जो बात अपनी मनवाऊँ सखी क्या करना है जो छोड़ ज़ज्बात अपनाऊँ सखी क्या हो जाएगा जब हर समय मेरा ही मेरा हो कभी तो औरों के अरमानों को भी सजाऊं सखी। जब जाऊँगा तो क्या लेकर जाऊँगा मोहब्बत के अहसासों पर मिट जाऊँगा मेरे वसीयत में बस प्यार ही प्यार निकले ऐसी तिजोरी मैं दुनिया को छोड़ जाऊँगा। अपने- पराये की पहचान क्यों करूं भीड़ के हर एक को मैंने कुटुंब बनाऊँ दुनिया पागल कहे मैं दीवान बन जाऊँ दिलों में उतरने की मैं सीढ़ी बनाऊं सखी। हे सखी ! तुम परेशान न हो मेरे इस व्यवहार से हैरान न हो जीने दो जिंदगी मुझे अपने तरीके से जब जाऊँ तो कुछ बचा अरमान न हो। मैं ऐसा ही हूं मुझे ऐसे ही स्वीकार करो मेरे मूल को न बदलो न प्रयास करो मेरा अस्तित्व ही बावरापन पर टिका है सुधार गया तो फिर मैं हूं ही नहीं सखी। कुछ तो टीस है जिसकी मैं दवा करता हूं प्यार में ही जीता और प्यार में ही मरता हूं प्यार का नशेड़ी प्यार पीता और उड़ाता हूं प्यार में मदमस्त मैं प्रेम धुनी लगाता सखी।
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
