नज़्में
वो नज़्में लिखा करती थी, और मैं उसे लिखा करता था। बात लिखने की थी ही नहीं, वो कुछ मुझसे कहा करती थी, और लिखा कुछ और करती थी। हर लफ़्ज़ में इशारे छुपे होते थे, हर ख़ामोशी में सवाल। मैं पढ़ता रहा उसकी लिखावट, और वो पढ़ती रही मेरा हाल। शायद मोहब्बत भी यही थी— कहना कुछ और, और लिख देना कुछ और… जहाँ अल्फ़ाज़ कम पड़ जाते थे, वहाँ एहसास सब कह जाते थे।
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