"लकीरों से परे"
लोग हैरान हैं — "कैसे है इसका अंदाज़ इतना जुदा," पर मेरे सपनों का सूरज हर संदेह से रोशन होया है। इच्छाएं भी हैं, हौसले भी हैं, और कुछ तन्हाइयाँ भी, मैंने खुद को थाम लिया जब हर तरफ परछाइयाँ थीं। मैंने देखा है अच्छाई को, इंसानों से नहीं — खुदा से, जो मिलता है सुकून कहीं, वो आता है अंदर की सदा से। मुझे न आंको लिबास से, मेरे इरादे फौलादी हैं, संस्कृत पढ़ता हूँ, मगर सोच मेरी आज़ादी है।
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