जिंदगी
शाख पे बैठी हुई, झूम-झूम के हँस रही, ज़िंदगी कुछ इस तरह गुफ़्तगु है कर रही। देखती है बेरहम, पुर सुकूँ हर इक घड़ी, जैसे हो वो मौन में,सर्द साया गम भरी बादलों की ओट में, चाँद-सी है मुस्कुराई, पर ज़मीं पर दर्द की बारिश कभी भी थम न पाई मैं खड़ा पतझड़-सा गुमसुम ,हर हरापन भूलकर वो हवा में खिलखिलाई मानो मुझको छेड़कर मुझसे आँखें चार करके, मुझपे ही है हँस रही, जैसे हो मेरी विवशता,मुझको ऐसे तक रही एक तमाशा वो रचे, और दर्शक मैं बनूँ, क्या अजब ये खेल उसका—मैं हीं क्यों हर क्षण सहूँ? हर सवेरा फेंकता है एक अनूठा प्रश्न फिर, उत्तर में बस मौन देता, ये समय का व्यंग्य चिर। जैसे जीवन खुद स्वयं ही शायर बना बैठा हो अब दर्द की नज्में सुनाकर के चैन से सोता हो अब नियति की शाख पर, बैठी कोई मृग-तृष्णा, सत्य की रोशनी में भी खोजती इक कल्पना। हास के चादर को ओढ़े, विष का प्याला थाम कर और कहती—"पी जा इसको जीवन का हाला मन कर!" राजीव......
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