कमासुत मनई...
आजु के जमाना में,लोग बस देखला कमाई मनई के मन के पीड़ा, केहू के ना बुझाई हर दुख-दर्द के, कहाँ केहूसे कहल जाला कुछ त खुदे से ही समझ जाये के होला मनई के मन में होला,समुंदर जइसन गहराई हंसी के ओढ़नी ओढ़ के, पीरा छुपाई दिन-रात के संघरष में, सपना बुनत रहेला अपने दुख-दर्द के, चुपचाप सहेला रोटी के फिकिर में, बीत जाला उमिरिया बाकी केहू ना पूछे, का हाल बा जियरिया दुनिया त देखेला बस, हंसी के परछाई टूटल सपना के पीड़ा,केहू के कहाँ बुझाई सब कुछ कहे के जरुरत ना होला कुछ बात मन से भी करें के होई थोड़ा सहारा, थोड़ा प्यार जरुरी, मनई के भी इंसान समझे के होई एक नजर में ना आंकल जाला जिनगी हर मुस्कान के पीछे होला पीरा गहरी समझे के चाही, दिल से दिल के बात तभी समझ पइबा,जिनगी के असली बात
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