सपनों का भारत तिरंगे की कहानी
ये आज तिरंगा झंडा भी खिन्नित हो बोल उठता है क्यों भारत आजकल फहराने से ज्यादा दफनाने के काम आता हूं बौखला उठता है लहज़ा जब आधे शरीर में जवानों की अर्थी आती है ऐ सत्ता वालो तुम तो न लेते एक इंच भी कम वो बूढ़ी मां आधे शरीर में कैसे सबर कर जाती है ये वो ही राजनीति है साहब जहां हमारा हमसे लेकर हमको ही खिलाते हैं ये बात तो वो ही हुई की हमारी चिता जलाकर खुद की कुर्बानी बताते हैं अरे तुम क्या दोगे एक सैनिक की मौत का हर्जाना रूह कांप जाती है जनाब जब नन्हें तोतले मुंह से आवाज आती है कि पापा आज तो नहीं आए पर कल जरूर आना ये खुददारी कब तक चलेगी देश के जवानों की अर्थियां कब तक सजेंगी अक्स की चाह में कब तक अश्क बहेंगे इन सत्ता के भोगियों को कब तक हमारे वीर जवान सैल्यूट करेंगे ज्यादा तो कुछ नहीं कहूंगी बस अपनी कविताओं से नए भारत के सपने बनूंगी एक दिन तो होगा वो जब भारत नूर ए आफताब सा चमकेगा ये सोने की चिड़िया वाला भारत कभी तो सोने का बाज बनकर लौटेगा अब चिंगारी नहीं सीने पर सोले दमके विश्वगुरु की ख्याति देने को हम भूखों जैसे तड़पे काश ये बुने हुए सपने बेबस बेबुनियाद न हो जब तक सपने साकार न हो तब तक शीतल सीने की आग न हो
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