जीवन
जलता पानी, डूबता सूरज — ये दृश्य भी इक कथा है, हर अंत में एक आरंभ छुपा, यही जीवन की व्यथा है। साँझ की चुप्पी कहती है, दिन भर का शोर व्यर्थ था, जो पाया, खो गया यूं ही — जो खोया, वो ही अर्थ था। धूप की आख़िरी किरणे जब पानी में पिघलती हैं, तब लगता है आशाए भी सूरज के साथ में ढलती हैं। वक़् बहता नहीं, ठहरता भी नहीं — बस देखता है, हम समझते हैं जीत, मगर वो हर पाँसा फेंकता है। डूबता सूरज कहता है — थकना भी ज़रूरी है, हर दिन के बाद रात में - ठहरना भी ज़रूरी है। उजास में जो दिखे नहीं, वो अंधेरे में उभरते हैं, असली सवाल तो अक्सर सन्नाटे में बिखरते हैं। इस डूब में एक सीख है — हर हार कोई हार नहीं, कल फिर से उठेगा सूरज — और यही संसार सही। राजीव
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