पतझड़
बिखरे पत्तों से पूछो जीवन की ये कहानी जुदाई का आलम ये मौसम ऋतु सुहानी कुछ तो बात रही होगी मौसम में रंग यू ही नहीं बदले पत्तों ने कितने अरमां बने होंगे इनकी छांव में कितना दर्द सहे होंगे ये अपने घाव में क्या ये हाल ये अपना सुनाए गिर कर बीती ये किससे बताए चादर धरती पर ये कैसे बिछाए संग हवा उड़ चले कभी पैरों तले छोड़ दामन ये शरीर का ये कहां चल पड़े कैसे ये धरती आकाश गगन ये सब देख रहा है पतझड़ का मौसम ये सब कैसे देखो झेल रहा है
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