"तन्हा रास्ते, ज़िंदा मैं"
इन आँखों ने देखा है तन्हाई का रंग, हर रास्ता अकेला था, हर पल था जंग। ज़मीन टूटी थी, आसमाँ भी दूर, पर दिल ने कहा — रुकना नहीं, मजबूर। ख़यालों में एक क़दम रख के तो देख, हर सोच में एक समंदर है, गहराई की रेख। हर ज़ख्म कुछ कहता है, हर आँसू एक दास्ताँ, मैं गिरा बहुत, पर कभी हारा कहाँ? रूह की तहों में उजालों की तलाश थी, अंधेरे ने भी मेरी आवाज़ से साज़ की। ख़ामोशियों से बात की, सायों को समझा, हर टूटा सपना भी मुझे कुछ सिखा गया। मैं जला, मैं बिखरा, पर मिटा नहीं, टूटी सांसों के बीच भी मैं रुका नहीं। इन आँखों ने देखी है वो सच्चाई, जो दुनिया छुपा ले, वो मेरी परछाई। अब न डर है, न कोई पर्दा है, सच बोलती है रूह, और चेहरा मेरा आइना है। मैं टूटा था, पर अब मुस्कुराता हूँ, खुद की ही राख से फिर से बन जाता हूँ। मैं ज़िंदा हूँ — हर दर्द के साथ, मैं ज़िंदा हूँ — अपनी ही बातों के साथ। ना हार मेरी पहचान है, ना डर मेरी ज़ुबान है। S_G
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