ये प्रश्न?
है दुविधा सी मेरे मन में, मन ना जाने क्यूँ व्याकुल है कुछ प्रश्न छुपे हैं भीतर में, बस उनको लेकर आतुर है क्या प्रेम से मिलती शीतलता या तड़पन में भी प्रेम बसा क्या प्रेम का होना मिलना है या बिछड़न में भी प्रेम बसा क्या प्रेम बसा है औषधि में,या पीड़ा में भी प्रेम बसा जो प्रेम के नाम पर खेल रहे उस क्रीड़ा में भी प्रेम बसा? ये प्रेम भला क्या भाव हुआ, कोई भेद जरा बतलाओगे, यदि प्रेम में पाना खोना है, तो तुम फिर कितना पाओगे यदि प्रेम स्वार्थी नहीं हुआ तो क्या वो प्रेम यथार्थ है ? जिसमे सांत्वना का भाव दिखे, क्या वो केवल परमार्थ है, ये प्रेम कसौटी बहुत बड़ी, इस दुविधा में खो जाऊँ ना कहीं प्रेम खोजने के पथ में, मैं खुद पागल हो जाऊँ ना!
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