"चलो अब लौट चलते हैं"
काफिरो के मोहल्ले से नाजायज "हो हल्ले" से चलो अब लौट चलते हैं... न गहरा ये समंदर है न मोती इसके अंदर है चलो अब लौट चलते हैं... न पंथी को ठिकाना है ये पतझड़ का जमाना है चलो अब लौट चलते हैं.... ये महफिल गुफ्तगू की है फिक्र किसको दिलों की है चलो अब लौट चलते है... चलो अब लौट चलते हैं....
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