"कहाँ खो गया इंसान?"
जब बच्चा जन्म लेता है, ना जात पता, ना ज़ुबान, बस हँसता है, बस रोता है, वो सबसे पहले है इंसान। फिर भाषा का लेबल चिपका, "तेरा हिंदी, मेरा तमिल", शब्दों से दीवारें उगीं, मन से मन हुए मुश्किल। फिर जात का खेल शुरू हुआ, किसी को ऊँच, किसी को नीच, जो श्रम करे, वो छू न सके, जो खाए राज, उसे कोई न खींच। धर्म की तलवारें निकलीं, प्रेम के मंदिर टूट गए, राम-रहीम की राहों में हम खून के दरिया लाँघ गए। गोरे-काले के नाम पे, रंग भी अब पहचान बना, जिसमें इंसान नहीं दिखा, वो सबसे बड़ा अंजाना। और इन सब भेदभावों में, कुछ चेहरे मुस्कराते हैं, जो ज़हर बाँट के नफरत से, अपनी रोटी पकाते हैं। वो नेता, वो उपदेशक, जो हमें हमसे दूर करे, कभी धर्म के झंडे तले, कभी इतिहास का शोर करे। पर ये देश तो मिट्टी है, ना हिन्दू, ना मुस्लिम, ना जात, ये खेतों की खुशबू है, ये बच्चों की मासूम बात। अब वक्त है जागने का, इन फ़र्कों को मिटाने का, भाषा, धर्म, जाति नहीं— इंसानियत अपनाने का। कंधे से कंधा जोड़ चले, ना पीछे कोई, ना आगे कोई, हम सबका दिल एक जैसा, ना राजा कोई, ना रंक कोई | By : Neeta Bhilangwal "हम सबको बाँटने की कोशिशें पुरानी हैं— पर अब आवाज़ें जाग चुकी हैं। ये कविता सिर्फ शब्द नहीं, एक चेतावनी है।"
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