अभागी
विलाप के भय से , दुखों को सांत्वना देने, उम्मदो के बिखरने के डर से रूदन करते हुए हृदय से, कहीं पुरुष पिता न दे कहीं आपा खो... तो कह दिया समाज ने भी भई लक्ष्मी हुई है ...बधाई हो! अरमानों की पतंग धागे से कट गई , खुशी की चिड़िया काले बादलों में कहीं छट गई बस न चला न तो प्राण ले लेता मुझे तो देवता ही चाहिए ,देवी नहीं चिल्ला कर यह भी कह देता , और मन मसोस उसे घर ले भी आए पर बेटी को भला दुनिया से कौन बचाए?? पांच साल की बेटी को भला साड़ी पहना पाऊं कैसे? उसके चंचल सागर को , भला बांध पाऊं कैसे...? और मै अभागी मां..... मैं स्वप्न विजय का देखती रही , बाण सी नज़र उसे छलनी कर भेदती रही.....!
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