खो जाने की आजादी
सोचा था, आज़ादी के लिए कमाएंगे, कहाँ पता था, इसी में खो जाएंगे। सपनों की राह पे निकले थे चलने, ज़िंदगी के धंधों में उलझते गए पलने। वक़्त की जेब में चुपचाप बिकते रहे, खुशियों की बोली लगती रही, हम दिखते रहे। जिस रौशनी को पकड़ना था अपने हाथों में, वो ही रौशनी अब आंखों को चुभती है रातों में। कमाने चले थे खुला आसमान, अब कैद हैं खुद के ही मकान। सोचा था रोटी से आएगी राहत, अब रोटी के पीछे ही रह गई चाहत ।
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