कहानियाँ
वो कहानियाँ लिखा करती थी, हर पन्ने में अपनी हर बात रखा करती थी। अपनी हर सौग़ात, हर एहसास, लफ़्ज़ों के सन्दूक़ में बंद किया करती थी। न जाने कैसे थे वो लोग, जो उसकी कहानियाँ सुना करते थे, तालियाँ भी बजा देते थे कभी-कभी, पर उसकी बात को अनसुना किया करते थे। वो अपने अंदर के तूफ़ान, नज़्मों में ढाल लिया करती थी, टूटते ख़्वाब, बिखरते डर, काग़ज़ पर उकेर लिया करती थी। वो लड़की अकेली थी हर जगह, भीड़ में भी खुद को ढूँढा करती थी, सबके लिए लिखती थी वो ख़ुद को, पर अपने हिस्से का सुकून छोड़ा करती थी।
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